
दिल्ली की मंडियों तक पहुंचने वाली गेहूं की हर बोरी सिर्फ अनाज नहीं होती। उसमें एक मौसम छिपा होता है। ठंडी रातें, धुंध वाली सुबहें, जनवरी की ठिठुरन, और फरवरी की हल्की धूप। गेहूं सिर्फ खेत में नहीं उगता, वह मौसम की लय पर उगता है। लेकिन अब यही लय टूट रही है।
Climate Trends की नई रिपोर्ट “Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India’s Major Wheat-Growing States” एक ऐसे बदलाव की कहानी बता रही है जो धीरे-धीरे भारत की खाद्य सुरक्षा के भीतर दाखिल हो चुका है। यह बदलाव अचानक आई किसी आपदा जैसा नहीं है। यह हर साल थोड़ा-थोड़ा बढ़ती गर्मी, छोटी होती सर्दियां, और बदलती रातों की कहानी है।
भारत हर साल करीब 107 मिलियन टन गेहूं पैदा करता है। दुनिया के कुल गेहूं उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है और देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि अब जलवायु परिवर्तन सिर्फ भविष्य का खतरा नहीं रहा। इसका असर खेतों में साफ दिखने लगा है।
रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में सर्दियों का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। सबसे बड़ा संकट सिर्फ दिन की गर्मी नहीं है, बल्कि रातों का गर्म होना है।
Climate Trends की Research Lead और इस अध्ययन की लीड ऑथर डॉ. Palak कहती हैं कि भारत के गेहूं उत्पादन के लिए सबसे कम चर्चा किया गया लेकिन सबसे चिंताजनक खतरा रात के तापमान का लगातार बढ़ना है। उनके मुताबिक गेहूं उगाने वाले लगभग सभी बड़े राज्यों में न्यूनतम तापमान, यानी रात का तापमान, दिन के तापमान से तेजी से बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में रात का तापमान दिन की तुलना में लगभग तीन गुना तेजी से बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी न्यूनतम तापमान में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर गेहूं की बालियों पर पड़ रहा है।
रात में ज्यादा गर्मी होने पर पौधे ज्यादा “respiration” करते हैं। आसान भाषा में कहें तो पौधा अपनी ऊर्जा जल्दी खर्च कर देता है। जो कार्बोहाइड्रेट दाने भरने में इस्तेमाल होना चाहिए, वह पहले ही खत्म होने लगता है। नतीजा यह होता है कि दाने सिकुड़ जाते हैं, वजन कम हो जाता है और गुणवत्ता गिर जाती है।
डॉ. पलक बल्यान के मुताबिक फरवरी और मार्च में अचानक बढ़ती गर्मी “grain filling window” को छोटा कर रही है। यानी वह समय जब गेहूं का दाना भरता है। फसल समय से पहले पकने लगती है और दाने अधपके व हल्के रह जाते हैं।
रिपोर्ट में एक और बड़ा संकेत उत्तर भारत के गेहूं बेल्ट से आया है। पंजाब और हरियाणा, जिन्हें देश का गेहूं भंडार माना जाता है, वहां पिछले तीन दशकों में उत्पादन वृद्धि दर लगातार गिर रही है।
1986 से 1995 के बीच हरियाणा में गेहूं की दशकवार वृद्धि दर लगभग 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015 से 2025 के बीच यही दर घटकर माइनस 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। पंजाब में भी लगभग ऐसा ही रुझान दिखा।
यानी खेती का क्षेत्र वही है, किसान वही हैं, लेकिन मौसम अब वैसा नहीं रहा जिस पर यह पूरी व्यवस्था खड़ी थी।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि फरवरी सबसे तेजी से गर्म हो रहा महीना बन गया है। 2010 से 2025 के बीच फरवरी में हर दशक लगभग 0.69 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की गई। मार्च और अप्रैल भी तेजी से गर्म हुए हैं।
इसका असर गेहूं के सबसे संवेदनशील चरणों पर पड़ रहा है। फूल आने और दाना बनने के समय अगर तापमान बढ़ जाए तो फसल जल्दी खत्म होने लगती है। कई जगह खराब अंकुरण, कम tillering यानी कम फुटाव, जल्दी पकना और कीटों का दबाव बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
लेकिन कहानी सिर्फ गर्मी की नहीं है। बारिश भी बदल रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिमी विक्षोभ अब देर से आ रहे हैं और मार्च-अप्रैल में ज्यादा बारिश ला रहे हैं। यही वह समय होता है जब कई राज्यों में गेहूं पक चुका होता है या कटाई चल रही होती है। ऐसे में अचानक बारिश पूरी फसल खराब कर सकती है।
गुजरात के किसान राम सिंह बताते हैं कि पहले खेतों में गेहूं को सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन अब कुछ महीनों में ही अनाज खराब होने लगता है।
राम सिंह कहते हैं कि अक्टूबर की गर्मी में बीज ठीक से अंकुरित नहीं होते। फिर फरवरी-मार्च की अचानक गर्मी दानों को जल्दी सुखा देती है। ऊपर से कटाई के समय बारिश हो जाए तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।
उनके मुताबिक अब कीटों का हमला भी बढ़ गया है। नमी बढ़ने से भंडारण मुश्किल हो गया है और खेती लगातार जोखिम भरा काम बनती जा रही है। गांव के कुछ परिवार खेती छोड़ने तक लगे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र कुमार ढाका कहते हैं कि पिछले कुछ दशकों में मौसम के पैटर्न में साफ बदलाव दिख रहा है। सर्दियां छोटी और गर्म हो रही हैं, जिससे गेहूं का प्राकृतिक growth cycle प्रभावित हो रहा है।
उनके मुताबिक कटाई के समय होने वाली बेमौसम बारिश और बढ़ती नमी फसल को नुकसान पहुंचा रही है। इससे दानों का रंग बदलता है, fungal infection बढ़ते हैं और गुणवत्ता गिरती है।
रिपोर्ट में पंजाब और हरियाणा के किसानों की चिंताएं भी दर्ज हैं। किसानों का कहना है कि नवंबर अब पहले जितना ठंडा नहीं रहता, जिससे गेहूं का germination प्रभावित होता है। वहीं फरवरी और मार्च की गर्मी grain filling stage को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है।
Kheti Virasat Mission के Executive Director उमेंद्र दत्त का कहना है कि यह सिर्फ जलवायु संकट नहीं, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य का भी संकट है। उनके मुताबिक दशकों की chemical-intensive farming ने मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता कमजोर कर दी है।
वे कहते हैं कि अब खेती को “yield-centric” मॉडल से निकालकर “soil-centric” और climate-resilient farming की तरफ ले जाने की जरूरत है। Mulching, crop residue management, indigenous seeds और soil organic matter बढ़ाने जैसे उपाय गर्मी और नमी के दबाव से लड़ने में मदद कर सकते हैं।
Climate Trends की Founder and Director आरती खोसला कहती हैं कि अब छोटे-छोटे coping measures काफी नहीं होंगे। उनके मुताबिक climate-smart agriculture, early warning systems और parametric insurance जैसे उपायों को तेजी से बढ़ाना होगा ताकि किसानों और खाद्य सुरक्षा दोनों को बचाया जा सके।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब India Meteorological Department यानी IMD ने 2026 के मानसून अनुमान को घटाकर long period average के 90 प्रतिशत तक कर दिया है। वहीं दुनिया की कई मौसम एजेंसियां 2015-16 के बाद सबसे मजबूत El Nino बनने की आशंका जता रही हैं।
भारत में गेहूं सिर्फ एक फसल नहीं है। यह करोड़ों लोगों की रोटी है। गांव की अर्थव्यवस्था है। और शायद यही वजह है कि खेतों में बदलता मौसम अब सिर्फ किसानों की समस्या नहीं रह गया। यह धीरे-धीरे हर रसोई तक पहुंचने वाली कहानी बनता जा रहा है।